Thursday, 18 September 2014

वो बंद खिड़की

       इस साल सरकार ने पहले से ही कुछ खाद्य पदार्थों के महंगे होने और जीडीपी में गिरावट की चेतावनी देशवासियों को दे दी है. वजह, मौसम विशेषज्ञों ने इस साल काम बारिश होने के आसार जताए हैं. गर्मी से बेहाल इंसान, जानवर, पक्षी सभी बारिश की आस लगाए बैठे हैं. और ख़ास कर किसान और ये प्यासी धरती. मानसून का सभी लोग बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे और देर से ही सही थोड़े बहुत छींटे लेकर मानसून आया भी.
         आज बारिश हो रही है और मेरे कमरे की खिड़की ठंडी हवा से ठक-ठक करती कभी खुल रही है तो कभी बंद हो रही है. परदे उड़ रहे हैं और बारिश के छींटे मेरे कमरे की फर्श को गीला कर रहे हैं. ये देख कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मैंने दौड़ कर अपने कमरे की खिड़की बंद कर दी और कड़ी लगा दी. महसूस किया की आँखों में शायद नमी आ गयी और कुछ पुरानी यादों ने घेर लिया.
            बारिशों से बहुत प्यार था।  जब बारिश हो तो खिड़कियाँ खोलकर उसकी चौखट पर बैठ जाना और i-pod से रोमांटिक गाने सुनना। ठंडी ठंडी हवाएँ जब बदन को छूती, तो अजीब  सरसराहट और गुदगुदी होती। माँ से पकौड़ियों की फ़रमाईश होती। और स्कूल से लौटते समय  बारिश हो तो दोस्तों के साथ भीगते भागते, छींटे मारते घर लौटना और घर आकर माँ से भीगने और कपडे गंदे करने के लिए डाँट खाना।  बारिश ये यादें फीकी पद गयीं।  हवाएँ चेहरे को गुदगुदाने के बजाय चोट कर रही थी और छींटे खौलते पानी की तरह मेरे मन को जला रही थी। और इसकी वजह.……?
           पिछले साल गर्मी की छुट्टियों में पापा से कहीं घूमने चलने की बहुत ज़िद की। आख़िरकार, उन्हें मना ही लिया और निकल पड़े हम सब मनाली और नैनीताल की ट्रिप पर। उन् पहाड़ियों और वादियों में पहुँच कर लगा की इस से खूबसूरत नज़ारा तो शायद हो ही नहीं सकता। हम पहले नैनीताल की वादियों में घूमने  निकले। हम सब वहां पहुंचे और मैंने अपने ढंग से घूमना शुरु कर दिया। मैं जल्दी-जल्दी आगे भागने लगी , मानो अभी नहीं तो ज़िन्दगी में ये नज़ारे फिर कभी देखने को नहीं मिलेंगे। जहाँ पापा मेरे चुलबुलेपन को देखकर हंस  वहीँ माँ डांटते हुए पीछे पीछे आ रही थी। उन्होंने मुझे रुकने को भी कहा लेकिन मैं अपनी ही धुन में, गुनगुनाते हुए आगे बढ़ती गयी। तभी हलकी हलकी बारिश होने लगी। माँ ने कहा  हमे लौट चलना चाहिए लेकिन हम बच्चों ने बारिश में घूमने की ज़िद्द की और पापा भी मान गए।
         पर काश की हमने माँ की बात मान ली होती। मैं और मेरा बड़ा भाई जल्दी जल्दी पहाड़ की ऊंचाइ पर जा पहुंचे और ऊपर  देखा तो माँ-पापा और मेरी छोटी बेहेन बहुत छोटे नज़र आ रहे थे। हमने उनसे जल्दी जल्दी ऊपर आने को कहा। पर तब तक कुछ यूँ हुआ की मेरे मुहं से सिर्फ एक चीख निकली और उसके बाद हमे कुछ पता भी नहीं। जाने क्या था वो ? उसके बाद का कुछ याद नहीं।
          आँखें खुली तो आस पास बस कुछ अनजाने चेहरे , जिनमे से कुछ घायल थे और कुछ लाशें थी। उन् चेहरे में अगर कोई जाना पहचाना चेहरा नज़र आया तो वो था मेरा  भाई। बाकी सबके बारे में पूछा तो वो रोने लगा और बोला कि " पता नहीं " . हमारे पास सिर्फ कुछ अनजाने चेहरे ही थे। और वो  हमारी ही तरह घबराये हुए से रो रहे थे और उनकी आँखों में भी हमारी ही तरह अपनों की तलाश थी। अगले ३२ घंटो तक हम भूखे प्यासे, रोते हुए वहीँ पड़े रहे। उसके बाद आर्मी के कुछ सोल्जर्स ने  से निकला। हमने जब उनसे अपने परिवार के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा की पता चलते ही वो हमे  इन्फॉर्म कर देंगे। सुरक्षित जगह  लेकर उन्होंने हमारे घर का अड्रेस और बाकी डिटेल्स पूछी। भैया ने उन्हें सब बता दिया। तब भी मुझे कुछ समझ में  नहीं आ रहा था। जैसे कोई होश ही न हो।
          उन् लोगों ने हमे घर पहुंचा दिया। घर पहुंचे तो वहां दादी , नाना-नानी और मां मौजूद थे।  हमारे पहुँचते ही वो हमे सीने से लगा कर रो पड़े। हम मम्मी-पापा के बिना ही घर पहुंचे।  उस दिन के अखबार में तो वो दिन उत्तराखंड त्रासदी के नाम से छापा था लेकिन मेरे ज़हन में  को खोने के नाम से।
           अब सिर्फ दादी ,भैया और मैं हूँ। आज इस हादसे को एक साल से ज़्यादा हो चुके है पर इंतज़ार आज भी है। आज भी जब दरवाज़े पर कोई दस्तक होती है तो दौड़ कर दरवाज़ा खोलती हूँ , इस उम्मीद में की शायद दरवाज़े के उस पार माँ-पापा और छोटी होंगे। एक बार फिर शायद हम साथ होंगे। पर अब ऐसा शायद कभी न हो। दिमाग समझाता है पर दिल समझता नहीं। और यही वजह है की बारिशों का इंतज़ार अब ख़त्म हो चुका है। और बारिशों के वक़्त मेरे कमरे की खिड़की अब बंद ही रहती है क्योंकि बारिश अब खट्टी मीठी यादें नहीं सिर्फ अपनों को  डर और वो बदसूरत, खौफनाक यादें लाती हैं।

Friday, 22 August 2014

Be Dynamic

Changes are beautiful. Always welcome them. May be they bring you up as a "BETTER YOU & BEAUTIFUL YOU". And if not so, atleast it gives you a learning experience and strength to fight such unwelcoming changes.

Sunday, 17 August 2014

Wish U Were Here


                WISH    YOU   WERE   HERE……

I wanted to get out of my melancholy,
I kept trying,
Very often I have seen Papa crying.

I am on the right track but still feel lost,
Cant get you back even if I pay any cost.

What I feel I have a lot to share,
But what to do , you are not here.

Where are you I am dying to see,
Though you are not present here,
I know you are always there with me.

This is for you Mumma.Wish you are listening.


Saturday, 16 August 2014

ab jina hai apne liye

           
              वक़्त बदलता है ,दिन बदलते है और बदल जाते है मौसम। इस दुनिया में कुछ भी एक जैसा नहीं रहता।  न वक़्त, न मौसम , न रिश्ते , न इंसान।
किसी फिलॉसफर ने कहा है की बदलाव समाज और व्यक्ति के लिए बेहद ज़रूरी है।लेकिन अगर ऐसा है तो मेरी ज़िन्दगी तुम्हारे बदलने से क्यों रुक गयी।
               बात क्या हुई ? तुमने आज तक नहीं कहा। आखिर इतना क्यों बदल गए ?
               वो बातें बदल गयी , जहाँ हंसी अठखेलियाँ  और प्यार होता था,वहां एक शब्द भी नहीं और अगर आये तो इतने बेरस।
               वो आँखे बदल गयी। जहाँ चमक थी ,मुहब्बत  थी ,जो मेरी आँखों में झांकती थी  अब उन्हें नजर मिलाना तक गवारा नहीं। जिंदगी भर हाँथ थम कर चलने के वादे ,कभी न मिलने की चाहत में बदल गए। क्यों ?  क्युकी शायद उन हाथो में अब नए हाँथ है।   बातो में नयी बात और आँखों में नया चहरा
               वाकई इन्सान कितनी जल्दी बदल जाते है। उनके साथ बदल जाते है रिश्ते। लेकिन ये चहरा ऐसे बदल जायेगा ,ये यु सोचा न था। अब सोचती हु की तो लगता की जो बदला वो शायद मुखौटा था। असली चहरा तो मैंने देखा ही नहीं ,अगर देखा होता तो ख़ुशी ,गम और चाहत बेबसी में न बदलती। लेकिन वो कहते है न की बदलाव जरुर आता है ,जैसे रात के बाद सवेरा और पतझर के बाद वसंत।
               इसीलिए अब मैं भी बदलरही हूँ। पुराने वक़्त की तलाश अब नए रास्तो की तलाश में बदल गयी है। आँखों की नमी फिर चमक बन रही है और कमजोरी ताक़त क्युकी अब जीने की वजह बदल गयी है. अब किसी और के लिए नहीं बल्कि अपने और अपने अपनों के लिए जी रही हूँ।