वक़्त बदलता है ,दिन बदलते है और बदल जाते है मौसम। इस दुनिया में कुछ भी एक जैसा नहीं रहता। न वक़्त, न मौसम , न रिश्ते , न इंसान।किसी फिलॉसफर ने कहा है की बदलाव समाज और व्यक्ति के लिए बेहद ज़रूरी है।लेकिन अगर ऐसा है तो मेरी ज़िन्दगी तुम्हारे बदलने से क्यों रुक गयी।
बात क्या हुई ? तुमने आज तक नहीं कहा। आखिर इतना क्यों बदल गए ?
वो बातें बदल गयी , जहाँ हंसी अठखेलियाँ और प्यार होता था,वहां एक शब्द भी नहीं और अगर आये तो इतने बेरस।
वो आँखे बदल गयी। जहाँ चमक थी ,मुहब्बत थी ,जो मेरी आँखों में झांकती थी अब उन्हें नजर मिलाना तक गवारा नहीं। जिंदगी भर हाँथ थम कर चलने के वादे ,कभी न मिलने की चाहत में बदल गए। क्यों ? क्युकी शायद उन हाथो में अब नए हाँथ है। बातो में नयी बात और आँखों में नया चहरा
वाकई इन्सान कितनी जल्दी बदल जाते है। उनके साथ बदल जाते है रिश्ते। लेकिन ये चहरा ऐसे बदल जायेगा ,ये यु सोचा न था। अब सोचती हु की तो लगता की जो बदला वो शायद मुखौटा था। असली चहरा तो मैंने देखा ही नहीं ,अगर देखा होता तो ख़ुशी ,गम और चाहत बेबसी में न बदलती। लेकिन वो कहते है न की बदलाव जरुर आता है ,जैसे रात के बाद सवेरा और पतझर के बाद वसंत।
इसीलिए अब मैं भी बदलरही हूँ। पुराने वक़्त की तलाश अब नए रास्तो की तलाश में बदल गयी है। आँखों की नमी फिर चमक बन रही है और कमजोरी ताक़त क्युकी अब जीने की वजह बदल गयी है. अब किसी और के लिए नहीं बल्कि अपने और अपने अपनों के लिए जी रही हूँ।
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